Tuesday, 6 June 2017

शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है

शायद मेरे बदन की रुसवाई* चाहता है
दरवाज़ा मेरे घर का बीनाई* चाहता है

औक़ात-ए-ज़ब्त* उस को ऐ चश्म-ए-तर* बता दे
ये दिल समंदरों की गहराई चाहता है

शहरों में वो घुटन है इस दौर में के इंसाँ
गुमनाम जंगलों की पुरवाई चाहता है

कुछ ज़लज़ले* समो* कर ज़ंजीर की ख़नक में
इक रक़्स-ए-वालेहाना* सौदाई* चाहता है

कुछ इस लिए भी अपने चर्चे हैं शहर भर में
इक पारसा* हमारी रुसवाई* चाहता है

हर शख़्स की जबीं पर करते हैं रक़्स* तारे
हर शख़्स ज़िंदगी की रानाई चाहता है

अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौ-जवानी
इस उम्र का मुसाफ़िर तंहाई*  चाहता है

मैं जब ‘क़तील’ अपना सब कुछ लुटा चुका हूँ
अब मेरा प्यार मुझ से दानाई चाहता है

* रुसवाई  –  बदनामी, अपमान
* बीनाई  –  दृष्टि
* औक़ात-ए-ज़ब्त  –  संयम की गरिमा
* चश्म-ए-तर  –  आंसुओ से भरी आँखे
* ज़लज़ले   –  भूकम्प
* समो  –  बुलंद, ऊंचा
* रक़्स-ए-वालेहाना – प्यार का नृत्य
* सौदाई  –  पागल
* पारसा  –  पवित्र
* रक्स  –  नृत्य
* याद-ए-नौ-जवानी  –  जवानी की यादे
* तन्हाई  –  अकेलापन
* दानाई   –  ज्ञान, बुद्धिमत्ता

क़तील शिफ़ाई

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