आप कहते हैं सरापा* गुलमुहर है ज़िन्दगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी
भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल
मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर* है ज़िन्दगी
डाल पर मज़हब की पैहम* खिल रहे दंगों के फूल
ख़्वाब के साये में फिर भी बेख़बर है ज़िन्दगी
रोशनी की लाश से अब तक जिना* करते रहे
ये वहम पाले हुए शम्सो-क़मर है ज़िन्दगी
दफ़्न होता है जहाँ आकर नई पीढ़ी का प्यार
शहर की गलियों का वो गंदा असर है ज़िन्दगी
* सरापा – सर से पैर तक
* तल्ख़तर – कड़वी
* पैहम – लगातार, निरन्तर
* जिना – अनुचित सम्बन्ध
* शम्स-ओ-कमर – सूरज और चाँद
अदम गोंडवी
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