क्या जाने किस खुमार में किस जोश में गिरा
वो फल शज़र से जो मेरे आगोश में गिरा
कुछ दाएरे से बन गए सतह-ए-ख्याल पर
जब कोई फूल सागर-ए-मय-नोश* में गिरा
बाकी रही न फिर वो सुनहरी लकीर भी
तारा जो टूट कर शब-ए-खामोश* में गिरा
उड़ता रहा तो चाँद से यारा न था मेरा
घाइल हुआ तो वादी-ए-गुल-पोश* में गिरा
बे-आबरू न थी कोई लग्जिश* मेरी क़तील
मैं जब गिरा जहाँ भी गिरा होश में गिरा
* सागर-ए-मय-नोश – शराब पीने का गिलास
* शब-ए-खामोश – रात की खामोशी
* वादी-ए-गुल-पोश – फूलों की घाटी
* लग्जिश – भूल, गलती
क़तील शिफ़ाई
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