Tuesday, 6 June 2017

हर बेज़ुबाँ को शोला-नवा कह लिया करो

हर बेज़ुबाँ को शोला-नवा* कह लिया करो
यारो, सुकूत* ही को सदा* कह लिया करो

ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िन्दगी
हर संगदिल को जाने-वफ़ा कह लिया करो

गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगाने-ख़ास*
जितने सनम हैं उनको ख़ुदा कह लिया करो

यारो ये दौर ज़ौफ़-ए-बसारत* का दौर है
आँधी उठे तो उसको घटा कह लिया करो

इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत* न बढ़ सके
तुम उसको नुक़्स-ए-आब-ओ-हवा* कह लिया करो

अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात* है
हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा* कह लिया करो

दिखलाए जा सकें जो न काँटे ज़ुबान के
तुम दास्तान-ए-कर्ब-ओ-बला* कह लिया करो

ले-दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया* क़तील
जब दिल जले तो उसको दिया कह लिया करो

* शोला-नवा  =  जिसकी आवाज़ में आग हो
* सुकूत  =  मौन
* सदा  =  आवाज़
* बंदगाने-ख़ास  =  विशेष उपासक
* ज़ौफ़-ए-बसारत  =   दृष्टि की कमज़ोरी
* क़द-ओ-क़ामत  =  डील-डौल
* नुक़्स-ए-आब-ओ-हवा  =  जलवायु का दोष
* राह-ए-नजात  =  मुक्ति का रास्ता
* रज़ा-ए-ख़ुदा  =  ईश्वरेच्छा
* दास्तान-ए-कर्ब-ओ-बला  =  दुखों की कहानी
* निशान-ए-ज़िया  =  प्रकाश का चिह्न

क़तील शिफ़ाई

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